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‘कैसे जियें बुढ़ापा’ भारत गौरव मुनि पुलकसागर – ज्ञान गंगा महोत्सव में

बचपन में ज्ञान, जवानी में ध्यान और बुढ़ापे में पुण्यार्जन करो

जवानी का प्रमाण पत्र होता है बुढ़ापा

तन से भले ही बूढ़े हो जाओ, लेकिन हौसला मत टूटने देना

हताश होकर जीवन मत जीओ मेरे भाई

वृद्धावस्था में भी कुछ न कुछ करते रहो, नहीं तो जीवन में जंग लग जाएगी

हाय-हाय के जीवन से निकलो, नहीं तो यह प्राण भी मुश्किल में निकलते हैं

जीवन के 50 वर्ष निकलते ही समझ लो कि अब तो वृद्धावस्था की ओर चल पड़े हैं। छोटे बच्चों के पैर और बुढ़ापे में जुबान अधिक चलती है। तुम्हारी जवानी कैसी बीती, इसका प्रमाण पत्र बुढ़ापा हुआ करता है। मेरे बुजुर्गों तुम अन्तिम समय तक यह मत सोचो कि हम बूढ़े हो गये। जीवन के अंतिम समय तक कुछ न कुछ करते रहो, बुढ़ापे में भी चलते-फिरते जीवन की गाड़ी को चलाते रहो, नहीं तो तुम्हारे शरीर और चिन्तन में जंग लग जाएगी।

प्रकृति देती है बुढ़ापे की दस्तक : मुनिश्री ने कहा कि सबसे पहले कलम के बाल सफेद होते हैं। प्रकृति हमें कान में संकेत देती है कि अब काले काम छोड़ो और सफेद चादर की तरह अपने जीवन को उजला कर लो। बत्तीसी टूटते ही संकेत मिलता है कि अब माल मलीदा खाना छोड़ो और सात्विक दाल रोटी खाकर जीवन का आनंद लो। लेकिन वाह रे आदमी की जिन्दगी, वह इन संकेतों को नजर अंदाज कर बालों पर खिजाव और मुंह में बत्तीसी लगवाकर तृष्णा का जीवन जीता रहता है।

मुफ्त का नहीं कमाकर खाने की आदत डालो : मुफ्त की रोटी खाने वाले युवा का जीवन 80 वर्षीय वृद्ध व्यक्ति के समान हो जाता है और 80 वर्ष का वृद्ध यदि कमाकर खाने का जज्बा रखता है, तो वह युवाओें जैसा जीवन जीता है। (अंकित जैन प्रिंस)

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