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बनावटी क्षमावाणी आपकी, स्वाभाविक सबकी

चौकियें मत, हकीकत से ही रुबरु करा रहे हैं। कभी इस बात का गर्व न करना कि क्षमावाणी यानि मुख से क्षमा मांगना, आपका, यानि जैन सम्प्रदाय का पर्व है और इस गलतफहमी में भी मत रहना कि क्षमावाणी साल में केवल एक बार (तीन बार मनाते ही कब हो) आती है।
हैरान मत होइये, यह पर्व हर उस जवान-बच्चे-बूढ़े, लेडीज-जेन्ट्स, गरीब-अमीर, नेता-अभिनेता, वकील-डॉक्टर, सीए-बीए, शहरी-ग्रामीण, पढ़ा-लिखा-अनपढ़ का है, जिसके मुख से कुछ गलत होते ही स्वाभाविक रूप से ‘सारी’, ‘माफ करना’, गलती हो गई शब्द निकल पड़ते हैं।
और यह पर्व केवल एक या तीन दिन तक ही सीमित नहीं है, बल्कि हर किसी दिन, किसी भी समय यह क्षण आ जाता है, जब आपके मुख से अनायास ये शब्द निकलते हैं, हकीकत में वही क्षण असली क्षमावाणी है, यह तो केवल बनावटी क्षमावाणी है, जहां शब्दों को बोलने की, पिरो ने की आप पहले ही तैयारी कर लेते हैं। क्षमावाणी तो वह है, जहां कोई तैयारी नहीं करनी पड़ती, गलत होते ही मुख से निकल पड़ता है ‘सारी’ या ‘माफी’। आप कह सकते हैं, कि सॉरी या माफी में, क्षमा वाला भाव कहां। पर हकीकत तो यह कि आज क्षमावाणी के दिन कही जाने वाली क्षमा हकीकत में है ही कहां। यह क्षमा केवल अपनों से, मित्रों से ही दी और ली जाती है। शत्रु से, पराये से, तो कहना तो दूर, आंखें मिलाने की भी हिम्मत नहीं होती। कहने में न मन साथ होता है,  न काय, बस वचन से बोल दिया जैसे क्षमावाणी पर्व को कहकर सार्थक कर दिया है। वहीं जब गलती होते ही सॉरी या माफी  मुख से तुरंत निकल आता है, तब वह सामने वाले को भी नहीं देखता, यानि वचन के साथ मन से भी, काय से भी। और जब तक मन-वचन काय एक साथ नहीं होंगे, क्षम का भाव नहीं होगा, क्षमा कहना सार्थक नहीं होगा।
अगर ‘उत्तम क्षमा’ के पहले ही दिन क्षमा को धारण कर लिया होता तो आज वाणी में उतरते हुए अपने-पराये का सलेक्शन नहीं करना पड़ता। शायद हमने हम पर्व को धारण करने की कोशिश ही नहीं की। केवल पूजा की लाइनें दोहराने, चावल इधर से उधर करने और नागिन की धुन पर थिरकने में ही यह पर्व गुजार दिया। यही क्यों, बरसो से यही तो करते आ रहे हैं। रंचमात्र भी पथ पर अग्रसित नहीं होते, निरर्थक हो जाता है। क्योंकि यह पर्व मनाया नहीं जाता, धारण किया जाता है। हमने इतने दिन भीतरी दर्शन की बजाय, बाहरी प्रदर्शन में एक बार फिर गुजार दिये और दावा करते  हैं कि हमने क्षमावाणी पर्व जोर-शोर से मना लिया।

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