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भगवान बाहुबली मूर्ति निर्माता वीर चामुण्डाराय सत्य युधिष्ठिर कहलाते थे

श्रवणबेलगोला में विश्व प्रसिद्ध भगवान बाहुबली की विशाल एवं भव्य मूर्ति बनवाने वाले महापुरुष चामुण्डाराय गंगवंशी राजा राचमल्ल के मंत्री एवं प्रधान सेनापति थे। गंगवंश के राजाओं ने मैसूर व आसपास के प्रदेशों पर लगभग एक हजार वर्ष तक शासन किया तथा जैन धर्म के प्रचार-प्रसार के साथ ही अनेक जैन मंदिरों का निर्माण भी कराया। उनका शासन काल कर्नाटक में जैन धर्म का स्वर्ण युग माना जाता था।

चामुण्डाराय गंगवंश के तीन राजाओं मारसिंह, राचमल्ल एवं उनके उत्तराधिकारी रक्कसगंग के मंत्री रहे। सेनापति के रूप में उन्होंने गंग राज्य को 2-4 बार नहीं बल्कि 18 बार युद्धों में विजय दिला कर अभूतपूर्व सेवा की। इसी कारण उन्हे समय-समय पर वीरमार्तण्ड, रणरंगसिंह, वैरिकुलकालदण्ड समरकेशरी तथा सुमटचूडामणि आदि अनेक गरिमापूर्ण उपाधियां प्रदान कर सम्मानित किया गया।

चामुण्डाराय आचार्य अजितसेन तथा आचार्य नेमिचन्द्र सिद्धांत चक्रवर्ती के शिष्य थे। उनके उपदेश सुनते थे और धर्म चर्चा करते थे। कहते हैं एक बार आचार्य नेमिचन्द्र प्राचीन ग्रंथ षटखंडागम का अध्ययन कर रहे थे, तभी चामुण्डाराय आ गए तो आचार्य ने यह सोचकर ग्रंथ बंद करके रख दिया कि चामुण्डाराय की समझ में कुछ नहीं आएगा, चामुण्डाराय ने धर्मचर्चा की और उन्हे वह ग्रंथ पढ़ाने का आग्रह किया तो आचार्य ने उनसे प्रभावित होकर सरल भाषा में एक ग्रंथ की ही रचना कर दी और उसका नाम उनके नाम पर ही गोम्मटसार रख दिया। चामुण्डाराय का एक नाम गोम्मट भी था, इसीलिए उनके द्वारा निर्मित बाहुबली की मूर्ति गोम्मटेश्वर यानि गोम्मट के ईश्वर भी कहलाई।

चामुण्डाराय ने धर्म ग्रंथों का भी गहन अध्ययन किया था। उन्होंने गोम्मटसार की वीरमार्तण्डी, चरित्रसार और चामुण्डाराय पुराण आदि ग्रंथों की रचना कर कन्नड भाषा के साहित्य में भी अपना उच्च स्थान बनाया। उन्हें अनेक धार्मिक उपाधियों से भी विभूषित किया गया था। सदा सच बोलने के कारण उन्हें सत्य युधिष्ठिर कहा जाता था। धार्मिक गुणों के कारण वे सम्यक्त व रत्नाकर तथा साधर्मी बंधुओं के लिए अण्णा यानि पिता के समान थे।

चामुण्डाराय ने इस विशाल मूर्ति के अलावा कई अन्य मूर्तियों, स्तंभों व मंदिरों का निर्माण भी कराया, जिनमें नेमिनाथ मंदिर, त्यागद ब्रह्मदेव स्तंभ, अखंड बागिलु, गुल्लिकाय जी की मूर्ति आदि प्रमुख हैं।

केवल चामुण्डाराय ही नहीं, उसका पूरा परिवार ही अत्यंत धार्मिक था। उनकी माता कालल देवी और धर्मपत्नी अजिता देवी तो बाहुबली मूर्ति निर्माण से सक्रिय रूप से जुड़ी हुई थी ही, उनकी छोटी बहन पुल्लबे ने भी कोयम्बटूर जिले के विजयमंगलम में चन्द्रनाथ मंदिर में संल्लेखना विधि द्वारा शरीर का त्याग किया था। उनके पुत्र जिनदेव ने भी श्रवणबेलगोला की चामुण्डाराय बसदि की ऊपरी मंजिल बनवाकर उसमें तीर्थंकर नेमिनाथ की प्रतिमा स्थापित कराई थी।

इस प्रकार शस्त्र, शास्त्र और शिल्प के क्षेत्र में गगनचुंबी कीर्ति को प्राप्त कर सन 990 में इस महान विद्वान, योद्धा ने संल्लेखना पूर्वक अपने शरीर का त्याग किया। उनका नाम चिरकाल तक इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित रहेगा। धर्म, संस्कृति और देशभक्ति की उस महान विभूति को शत-शत नमन। विशेष: पूज्य भट्टारक चारुकीर्ति स्वामी जी से मेरा निवेदन है कि यह महामस्तकाभिषेक चामुण्डाराय जी की स्मृति को ही क्यों न सर्मिपत कर दिया जाए।                                         –

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