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समर्थता के बाहर जाकर चाह करना दु:ख का कारण- मुनि श्री सुधासागर

मदनगंज-किशनगढ़। मुनि पुंगव सुधासागर महाराज ने कहा कि व्यक्ति अपनी स्वयं की जिंदगी में कुछ वो करना चाहता है और वो पाना चाहता है, जो उसके सामर्थ्य के बाहर है, व्यक्ति का यह सबसे बड़ा वीक प्वाइंट है। व्यक्ति इतना खाना चाहता है जो पाचन शक्ति से बाहर है और प्रकृति कहती है कि तुम उतना ही खाओ, जितनी तुम्हारी पाचन शक्ति है।

मुनि श्री ने आर.के. कम्युनिटी सेन्टर में प्रवचन के दौरान कहा कि ऐसा भाव कभी स्वयं की मूर्खता से आता है तो कभी दूसरों को देखकर आता है। हर क्षेत्र में स्थिति यहीं है। जितनी कुव्वत नहीं है, उससे ज्यादा इच्छाएं पाल रखी हैं। ऐसे व्यक्ति कभी सुखी नहीं रह सकते हैं। यही दु:खी होने का मूल कारण है।

जब घर में मेहमान आते हैं या महाराज का चौका लगता है तो हमारी यह संस्कृति है कि हम हैसियत से ज्यादा उनकी आवभगत करते हैं, उनके खाने के लिए विभिन्न व्यंजन बनाने के लिए अपनी ताकत लगा देते हैं। उनके सामने गरीबी नहीं, अमीरी दिखाते हैं। भले ही हम दो दिन भूखे रह जाएं। हम जब कभी रिश्तेदार के यहां जाते हैं, तो खाली हाथ नहीं जाते हैं। यहीं वह लक्षण है, जो आपको एक दिन अमीरी तक जरूर पहुंचाएगा।

उन्होंने कहा भगवान के सामने गरीब बनकर नहीं, अमीर बनकर जाओ। भगवान से कभी मांगो नहीं, मंदिर में चढ़ा कर आओ। ऐसा किया, तो कभी तुम्हारे जीवन में गरीबी प्रवेश नहीं करेगी। जिस घर में सब पुरुषों के बाद महिलाएं भोजन करती हैं, वो अन्नपूर्णा हाथ हो जाता है। वह जितना भोजन परोसती जाएंगी, उतना भोजन अपने आप बढ़ता जाएगा। कभी कमी नहीं आएगी।

मुनियों को आहार दान भूखे रहकर क्यों दिलाया जाता है? इस पर मुनिश्री ने कहा कि खा-पीकर महाराज को आहार दिया तो तुम्हारे यहां दरिद्रता बढ़ेगी और भूखे रहकर पहले महाराज को आहार दिया तो तुम्हारी दरिद्रता खत्म होकर तुम्हारी अमीरी बढ़ेगी- ये एक रहस्य है। तुमको भूखे रहकर आहार दिलाना, जैन दर्शन का उद्देश्य नहीं है। तुमने पहले खा लिया, फिर जो बचा वो महाराज व मेहमान को मत खिलाओ, पहले महाराज व मेहमान को खिलाओ फिर जो बचे वो तुम खाओगे तो उसका नाम है प्रसाद। इसके बाद भोजन पावन हो जाता है, पवित्र हो जाता है।

मुनिश्री ने कहा कि जो व्यक्ति नौकर के द्वारा कार्य करने पर समय बचाकर धर्म क्षेत्र में देते हैं। वे आगे जाकर ऐसे चक्रवती बनते हैं कि पानी का गिलास उठाकर भी नौकर देता है। सभी एक-दूसरे से हर काम में प्रतिस्पर्धा रखते हैं, किन्तु दान देने में कोई होड़ नहीं करता है। अगर अमीरी चाहिए, तो दान देने में होड़ करो।

– शेखरचंद पाटनी (राष्ट्रीय संवाददाता), किशनगढ़ मदनगंज

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