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स्वतंत्र होकर भी परतंत्र – आर्यिका सरस्वती भूषण

बिहारी कॉलोनी। स्वतंत्रता दिवस पर अपने विशेष प्रवचन में आर्यिका श्री सरस्वती भूषण माताजी ने कहा कि आज पाश्चात्य सभ्यता और संस्कृति के प्रति अंधी अनावश्यक दौड़ तथा देश से विदेश की ओर पलायन की रूचि हमें आज भी मानसिक रूप से परतन्त्रता की बेड़ियों में जकड़े हुए हैं। विदेशी भोजन, विदेशी भाषा और विदेशी रहन-सहन, पहनावा ही हमारी पसंद बन चुका है, यह वैचारिक पराधीनता नहीं तो क्या है?

आगम के आलोक में झांकने पर भी हमें अपनी अन्त: प्रवृत्तियां पराधीनता के बन्धनों में बद्ध ही नजर आएंगी। हमें विषय वासनाओं व क्रोधादि विभाव भावों की परतंत्र परणतियों से मुक्त होना है, आत्मा को स्वतंत्र बनाना है, मानवता को दानवता की ओर नहीं भगवत्ता की ओर कदम बढ़ाना है। स्व में पनपने वाली दुर्भावनाओं को तिलांजलि देनी है। तो आइये! स्वतंत्रता के पर्व पर हम संकल्प करें कि अत्यंत परिश्रम से प्राप्त स्वतंत्रता को बरकरार रखें। विदेशों में नहीं स्वदेश में बसना है तथा काम, क्रोध, लोभादि से मुक्त होकर शाश्वत वैभव को प्रगटाना है।      (अंकित जैन प्रिंस)

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